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वृन्दावन-विहारी

.नैडविमूषितकरान्वनीरदाभात्पीताम्बरादरुणनरिम्बफलघरोष्ठात्‌ .परिन्दून्दरसुखादरविन्दनेत्रतकृष्णात्परं किमपि तत्वमहं जाने

ई” सौपरमात्मने नमः भः => र्वकि्ाः | धरीमदरगबदीता संप्र अनेकानेक धरभ्रन्ोमे एक व्िकोप स्यान रखती है श्रद््णमगवान्‌ स्वय वक्ता आर्‌ उनक्ता कहना है यात मे द्वं पर्थ |" अतएत्र नीना सनातनधरभविलग्वियेजि = रानेखरी ह. इमं करो आशर्यं नहीं साय ही अन्य धर्मबरम्विय पं देका-देयान्तर- गाति्वे्ारा भौ यह्‌ अति प्ञ्ततित है इक दिन्य सन्देश किसी जाति वा दे्विदोपके हौ चि उपदेय नही, इतका अनल्य उगदेदा सार्वभौम है अपनी-अपनी मावनाके अनुसार असंख्य मलुरयोन गीतके उपदरयोका अदुप्तश कर्‌ संतारयानाकतो इुखपूर्वकं पृर। किया है, उसने च्ड आटम्बनते वे वेब मबस्तागर्‌ ही पार नद उन, अपने ओर मनोरथोको भी सिद्धि कर के है| गीता सवा्तमयी है समसन शा्तोका मयनकर्‌ जमृतमयी गौताकता आातरिमीव इभा है सर्मसिद्न्तोका जेता युन्दर्‌ अर युक्तियुक्त समन्दरय गौतमे मिच्ता है वैता अन्य करंसी परन्यमे कदाचित्‌ हौ उच्छ हो मत-मतान्तर्‌कि वादविवाट, परम निःश्रेयसो प्राप्तिके नाना मारगोकी वदावर्दका कोखाह गीतके गम्भीर्‌ उपदेदामे शान्त हकर परस्पर सहायक हो जाता है गौतमि नाना सिद्रान्तोका एकीकरण रेत न्द्रतासे किया गया है क्रि तख-जिन्ाघुक समस्त पय एक ही राजमार्गकी ओर प्रदत्त करते | अधिक्रार ओर माबनाकरे अनुप दौ साधनका अदेश मिट जता है| एक ओर्‌ भी विशेषता इस ग्रन्धग्पममे देखने मिलती है मलुष्यके लिये उतम आदर्का निश्चय किया गथा है ओर साथहौ उसको प्राप्त करनेकरं स्थि सुटम-से-षुठम स।धनभौ वताय गये हैँ कारण है करि इस सातसौ द्टोककी दी -सी गीताको कामयनु ओर कल्प-वृक्षकी उपमा दी जाती है महात्मान इसपर्‌ भाष्य रचकर्‌ आचायकरौ द्रौ पायी अनेक टीकाकारोने अपनी बुद्धिको इत कौटीपर कस पण्डित अर ज्ञानीकी दुर्टभ स्याति पायौ अर्‌ ्नचश्रु प्रदानकर्‌ इसके तत्वाुसन्धानमं साधारण गतिके खोगोको इसका मर्म दृदयह्वम करने सहायता प्रदान कौ वि्ाका परमछाम गीतके रहस्यको समञ्चना ही माना गया है अचायेनि अपने-अपने पिद्वान्तोको प्रामाणिकता स्थापन करनेमं गीताको एक मुख्य आधार माना दहै गीतापर्‌ भाव्य स्व अधने पिद्रान्तोको गीता-सम्मत वताना ही उनका ठ्छ्य रहय है| गीत।-विरोधौ किसी धर्मं वा सम्प्रदायका प्रचार बे असम्भव समन्ते ओर जिस धरम, आचार वा सिद्धान्तको ब्रह्महा गीततासे सिद्ध कर दिया, वह अवद्य ही सरवश्ाज्ञ ओर बेद-सम्मत मान च्चि जाता है | सम्प्रदाय, जाति ओर देशक भिन्ताका निराकरण करनेवाला गीता एक सावेमोम सिद्रान्त- प्रतिपादक म्रन्थ-रल्न है उसके उपदेरा ओर निदिं साधर्नोनि मानव-जातिके व्यि एकं महान्‌ धर्मक नीव डाली है उदके प्रचारसे प्राणिमा्रका कल्याण सम्मव है हदय-दोवल्यपर विजयी होकर गीतोक्त उपदेशसे मलुष्य कर्मरत हो सकता है वह मक्तिरसागृतका आस्वादन करता हमा ज्ञानं वन सकता है रेहिक ओर पारमार्थिक दोनो दी इुखोँकौ प्राति उपे अल्प `ग्राससे ही उपल्च्ष होनेमे कोई सन्देह नद रहता आधुनिक कारमं जो अनेकानेक जट प्रन निवयप्रति समाज ओर वयक्तिके समश्च उपलित होते रहते ओर बुद्धिको चकरा देते है, उनके सुठश्चनेके स्थि भी गीतामे

[२]

पर्य सामग्री विमान दै परन्तु खेद तो यह है कि रसे अवसरपर गीतासे पूणं सहायता नदं री जाती ] इस तुटिकी पूरतिके स्थि गीता-अचार्‌ ही एकमात्र उपाय है

गीताके अध्ययन, श्रवण आदिमे जो काम होता है उसको मगवानूने स्वयं अरजुनवे प्रति अपने उपदेशकी समापिमै कहा है; फिर गौता-प्रचारसे अधिक मगबस्रीत्यथं ओर कौन कार्थं मनुष्ये बन सकता है | मगवदाज्ञाको यथाशक्ति पाठन करने ओर उन्हीके कल्याणकारी उपदेशोके प्रचारकी ्ररणासे गीताका यह संस्करण प्रकाशित हभ है शांकरमाग्यका छपा मू तो घुरुम प्राप्त है परन्तु मूलके साथ हौ सरल हिन्दौ-अनुवाद नह मिङ्त। नवर्किंशोर्रेष, रखनऊसे प्रकाशित (नवर-माप्य, मे संस्कृत माप्य जर दीक्षां प्रकाशित हई थी परन्तु वह हिन्दी-अलुवाद स्वतन्त्र था तिसपर मी बह प्रन्थ अप्राप्य है ओर्‌ मूल्य अल्यधिक होनेसे सुकम नही, दूसश ग्रन्थ जिसमे अद्रैत- सिद्धान्तकी टीका शंकरमाष्यक्रे साथ छपी थौ वह कान्यक्रु्न -श्रीजगनाथ हुद्रारा सम्पादित होकर कख्कतेसे प्रकाशित हज था संवत्‌ १९२७ का ददितीय संस्करण हमारे देखनेमे आया है इसमे भी हिन्दी-अलुवाद स्वतन्त्र है शांकरभाष्यका अनुवाद नीं है ओर्‌ वह पुस्तक मी दुष्प्राप्यहै | गीताका एक संस्करण उपादेय था उका प्रकारान श्रीज्वाखप्रसाद भावने आगरेसे किया था | इस पुसकका केवल उत्तरमाग हमारे पास है रीथोकी छपी पुस्तक है, संवत्‌ दिया नष्टौ है इसमे शांकर ओर रामानुज-मष्यके सथ तीन टीकां भौ दौ है ओर्‌ भाषा-अनुवाद शंकरके आधारपर है | श्रीभागेवजी बडे विद्वान्‌ ये समग्र महामारतको मूढ ओर्‌ अनुवादसहित उन्होने प्रकाशित किया धा ओर वेदोौको मौ अ्सहित छापा था उनके प्रति कृत॑क्ञता प्रकाश करना हमारा धर्मं है खेद यी है धिं उनके ्रनथ कहं खोजनेपर भी अव्र नहीं मिकते। इन बातेकि उछेखसे केवर यदी ताप्पये है कि प्रस्तुत ग्रन्थी उपादेयता हमको स्वीकार करना अभीष्ट है मूर ओर हिन्दी-अनुवाद शकरमाष्यक्रा इसे पषिठे कह प्रकाशित इभ है, एेसा नहीं जान पडत ! हिन्दी-भाषा-माषि्योका प्रम सोभाग्य है जो अस्प मूल्यमे ही वे इस उच्च कोठिके ग्न्थको, जिसपर इतनी ठका हो चुकी है अब सहजम प्राप्त कर सक्ते है |

हमारे धरम-मरन्धोमं गोताका क्या स्थान है ओर अन्य ग्रन्थौसे उसका क्या सम्बन्ध है, विज्चसुधौजन भलीभ्रकार जानते है उसका संक्षिप्त वर्णन ही पर्याप्त होगा अखिल धर्मकः मूर हिनदूढोग वेदको मानते हे) वेद स्वतःप्रमाण ओर्‌ खिरकी वाणी है वेदक आश्ञाके अनुसार धर्म ओर अधर्स-कार्थका अन्तिम निर्णय होता है शखरीय ज्ञान मी हमको वेदसे ही प्रा होता है अन्थ धर्मग्न्य बेदोक्त ओर बेद-प्रतिपादित ध्ैको सुखम रोतिसे समञ्चनेके स्थि निमित इए है वेद हयी उनका आधार है परन्तु वेदके दो माग है--मन्त्र ओर्‌ ब्राह्मण ब्राह्मण-मागके अन्तर्गत यज्ञादि कर्मकाण्ड है ओर दूसरा आरण्यक वा ज्ञानकाण्ड है इती च्ञानकाण्डमे उपनिषदोकी गणना है प्राचीन -राख ओर वियाओम प्रायः एक उपनिपद्‌-भाग हा करता था जो तद्विषयक रहस्यमय ज्ञानकी शिक्षा देताथा। उच कोटिक अधिकारी उसको गुरुषएुखसे श्रवणकर प्राप्त कर्‌ सकते थे साधारण जिन्नाघुओंको उस

रदस्यभय ताच्िके ज्ञानका अधिकारौ नही समक्षा जाता था ओर उस्तकी प्ातिके लथि गुरुका उपदेश परमावर्यक साना जाता या

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वेदान्त-शाखमे उपनिषदका शती प्रक्र पुष्य धाम है ेदोका अन्तिम उपदेश वेदान्त | कमकाण्डीको उपनिषद्के रहश्यमय आध्यासिक ज्ञानका अधिकारी बननेपर ही उपदेदेसे ठम हो सकता थां इतना ध्यान रखनेकौ बात है कि गुद्यविदा या उपदेश अनधिकारीको देनेसे उसीका कल्याण था खार्थवदा गुप्त रखना सिद्धान्तानुकूढ नहीं था

वेदान्तके तीन प्रान है| श्रौत-परस्यान उपनिषद्‌ हैँ जो वेदके ही अंग है, दूसरा समार्त-प्रखान है जो गीता है ओर तीसरा प्रान दार्शनिक दै जो बेदव्यास-प्रणीत ब्रह्मसूत्र है इन प्रस्थानत्रयके आधारपर समस्त वेदान्त-साहित्यकी रचना हई है इन्दी पर भाष्य छिखिकर महात्मार्थो ओर ॒धर्म- ्रब्तकोने आचार्य-पदवी प्राप्त की है देशकी यही प्रणाडी थी किं प्रखानत्रयपर माप्य रचकरं अपने सिद्धान्तोकौ पुष्टि एवं प्रचार किया जाता था ] इनका समन्वय मार्ष्योद्वारा किये बिना किसी पिद्वान्त- को वेद या धर्म-मूलक कहनेका कोई साहस्र नहीं कर सकता था मतर यह कि सिद्ध(न्तप्रतिपादक खतन्तर म्रन्थ-र्बनाकी अधेक्ष प्रस्थानत्रयौपर माष्य ठिखनेको अधिक महत दिया गथा था ओर भार््योकि समन्वयसे मतकी पुष्टि की जाती थी।

गीताके अध्यार्योकी समापतिमें उपनिषदः शब्द आता है भगवानके श्रीयुखसे यह उपदेश इभा तो वेद्‌ ओर उपनिषद्का दर्जा उसे दिया गथा तो को$ आश्वर्यं नही, परन्त ेद अपोरुषेय है ओर उपनिषद्‌ श्रौत अतएव गीता स्मार्त-रस्थानके ही अन्तगेत है

गीतापर अनेक भाष्य ओर दका बनी है ओर अव मी उक्तके विवेचनम जो साहित्य वनता जाता है, वह मी उपेक्षणीय नहीं है परन्तु गौताका अध्ययन खतन््रूपसे बहत कम इभा है सिद्धान्त-प्रतिपादन ओर साम्प्रदायिक दृष्टस ही उसपर अधिक विचार इभ है | उप्तका परिणाम यह हआ है, कि गीताका वास्तविक अर्थं कठिनतासे समक्षम आता है | प्रतिभाज्ञाड आचार्यो ओर यकाकारोके मत-विभिनतासे साधारण बुद्धिके छोग षत्ररा जाते दै महाकवि जर उसके उच्कृष्ट काव्यम रेसी शक्ति होती है कि समाजकी प्रगतिके साय उमे नये अथं निकाठेः जाते है ओर उसके दारा नवीन भावनार्की पूर्ति होती रहती है फिर गीता-जैसे अतुनीय ्रन्थमे समय-समयपर्‌ आवस्यकतानुसार अनेक आशय ओर अर्थ निकाठे गये तो कोई नई वात नहं हे इसते ग्रन्थकी महिमाका परिचय भिर्ता परन्तु उसके भू सिद्ान्तोको यथावत्‌ निश्चयपू्वैक खोज निकाठना अवद्य ही अति कठिन हो जाता है जिस प्रन्थने अपूर्वं समन्वय किया है, वही मत-विभित्रताके कारण परस्परविरोधी सिद्रन्तो- का समर्थक बना स्यि गया है| मनुष्यको सप्यक्रा अंशा भी बुद्धिगम्य हो जाय तो बह कृतकृत्य हो जाता है माप्यकरारोने जैसा अपने अलुभवसे गीताके त्वक समश्च, वैसा ही वणेन किया है उनके समन्बयमे जो आनन्द्‌ है, बह ठनके पक्षपात ओर्‌ विरोधकी आखोचनामे नहं है अतप इस वातकी चर्चा यँ अभीष्ट नहीं है कि गीताके वास्तविक अर्थकी रक्षा भगवान्‌ शंकराचा्यने अपने माष्यमे कतक कौ है प्रचारकको सम्भवतः अययुक्तिका आश्चय आवस्यके होता है

यह मी याद रखना उचित है--

शचक्षरः चांकरः साक्चाद्वयासो नारायण; स्यम्‌ तयोविवादे सम्पाते जाने किं करोस्यदम्‌

{४ 1

भगवान्‌ शंकाराचार्यके कुछ सिद्रान्तोका स्थूखरूपसे वर्णन करम ˆ शक्तियुक्त है जिससे गीतामाप्यमे जो उनका दष्िबिन्ु है वह सहजम अवगत हो जाय } इस वातके माननेमे हमं कोई संकोच नहीं किं अनेक वाक्य गीतामे रसे मिढ सकते हैँ जिनको दैत ओर अद्रैत-सिद्धान्ती अपना प्रमाणवचन वना सक्षते है, गीतके कई मामिंक शोक दोनो पक्षोके समर्थक समक्षे जा सकते दै

्ीरांकाराचारथसे पूवं जो गीतापर्‌ माप्य लिखि गये उनमेसे अव एक भी नहीं मिठता मरतप्रपनन- के माप्यका श्रीदंकराचार्यने उल्छेख करिया है ओर्‌ उसका खण्डन मीं किया है मरप्पन्चके अनुसार कर्म ओर ज्ञान दोनोंते मिख्कर मोक्षकी प्राति होती है, श्रीरंकराचायं केवर विद्ध क्नान ही मे्षप्राप्तिका उपाय वताते हैँ यही भेद एकायन-सम्प्रदाय ओर उपनिपद्मे मी है एकायनके मतम आत्मा परमेश्रका अंग है ओर उक आश्रित है उपनिषद्‌ आत्मा ओर ब्रह्मकौ अभिन्नताका निरूपण करते हैं उपनिपद्मे ज्ञान मोक्षकां साधन है ओर एकायन प्रपत्तिसे मोक्ष मानते हैँ ओर्‌ गीताम स्पष्ट एसे वचन हैँ कि जीव ईशवरका सनातन अंश है (ममैवाश्नो जीवलोके जीवमूतः सनातनः” ओर्‌ ईैखरकी शरणागति ओर आश्रये ही उसका कल्याण है, “मामेकं श्ररणं रजः यह सिद्धान्तवाक्य प्रपत्तिका पोपक है | भक्तिदीन क्म व्यर्थं है ओर्‌ भक्तिहीन ज्ञान शुष्क एवं नीरस है उपनिपद्‌के असुसार प्रकृति भिथ्या है ओर एकायन प्रकृतिको नित्य परन्तु परमेश्वरके भधीन मानते है उपनिपद्के अनुसार ज्ञानीके स्यि प्रकृति वरिखीन हो जाती है ओर एकायनका मत है कि ज्ञानी प्रकृतिके खेख्को देखा करता है इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि पाञ्चरात्र ओर एकायनके सिद्धान्त गीताम स्पष्ट मिलते है परन्तु

यह भी सहसा नहीं कहा जा सकता किं श्रीरंकराचार्थके सिद्वन्तोका मी समर्थन गीता पूर्णतः नही करती

वैसे तो शंकरसि दान्तका विस्तृतरूपसे प्रतिपादन ब्रहमसूत्रके शारीरक नामक माप्यमे किया गया हे परन्तु गीता-माप्यसे मी वह मटीग्रकार्‌ अवगत हो जाता है सिद्धान्त अति संकषेपसे यह है कि मनुप्य- को निष्काममावसे खक प्रवृत्त रहकर चित्तदुद्धि करनी चाहिये चित्दुद्धिका उपाय ही फलाकांषाको छोडकार कम करना है जवतक चित्त्ुद्धि होगी, जिज्ञासा उत्पन नहीं हौ सकती, विना जिज्नासा- के मोक्षकी इच्छा ही असम्भव है पश्चात्‌ विवेका उदय होता है विवेकका अर्थं है नित्य ओर अनित्य स्तुका भेद समञ्गना संसारके समी पदार्थं अनिव्य है ओर केवर आत्मा उनसे पृथक्‌ एव नित्य है देता अनुम होनेसे विवेकमे ददता होती है, दृढ विवरकते वैराग्य उत्पन्न होता है ठोक- परखोकके यावत्‌ सुख ओर मेगोके प्रति पूर्णं विरक्ति. बिना वैराग्य दृद नदी होता अनित्य वस्तुओमे वैराग्य मोक्षका प्रथम कारण है ओर इससे शम, दम, तितिक्षा ओर कर्म-तयाग सम्भव होते इसके पश्चात्‌ ोक्षका कारण नो कान दै, उप्तका उदय होता है त्रिना विद्र जञानके मो मिस

प्रकार मी नहीं मिरु सकता योगेन सांख्येन कर्मणा नो विद्या बरह्मात्मकचोधेन मोश्चः सिद्धयति नान्यथा

जिन साथनोका अनित्य है वे मोक्षके कारण हो हौ नहं सकते मेका खूप है जीवाला-परमासाक अमिनताका ज्ञान दोनो एक स्प है, इसी ज्ञानका नाम मोक्ष है

[ 1

जीवात्मा.प्रमामाम जो भेद माढम होता है वह गरकृतिके कारणसे है इस भरान्तिकौ निदृत्ति ज्ञानद्ारा होती है द्वैत जो मासता है उसका कारण माया है ओर वह माया अनिर्वचनीया है | तो वह सत. है ओर असत्‌ है ओर दोनोहीके धर्म उसमे भासते है इपील्यि उसको अनिर्वचनीया विरोषण दिया गया है } वास्तव माया भी मिथ्या है वयोकि सतूसे असतकी उत्पत्ति सम्भव नदीं ओर्‌ सत्‌-असत्का मेक भी सम्भव नहीं ओर असते कों शक्ति हौ नहीं अतएव जगत्‌ केवल भ्रन्तिमात्र है जर खप्तवत्‌ है |

भगवान्‌ शंकराचा्यको भायवादी' कहना न्याय्तंगत नद उन्होने मायाका प्रतिपादन नही विया जत्र विप्षौ दृध्यमान परन्तु मिथ्या जगत्‌का कारण आग्रहपूर्वक पूता है तो मायाको, जो खयं मिथ्या है, वता दिया जाता है | यही कारण है कि जीवभाव वा जीवका यह अनुभव किं वह वद्ध है, वा्तवमें कल्पित है, अ्ञानके आवरणे जीव अपने खरूपको भूखा इआ है ओर ज्ञान ही इस अज्ञानका नारक है

भगवान्‌ शंकराचायं निचृत्ि-मागेके उपदेष्टा हैँ जर गीताको भी उन्होने निशृत्ति-मार्-अतिपादक ्रन्थ माना है उनके मताुप्ार संन्याप्तके विना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता यही उनका पुनः-पनः कथन है परन्तु इतना ध्यान रखना उचित है किं कर्मं वा प्रवृत्ति-मार्गको वे चित्त-छुद्धिके च्ि आवश्यक समञ्चते है अतएव वे समीको संन्यासका अधिकारौ नहीं मानते सचा संन्यास अर्थात्‌ विद््सन्यास वही है जिसमे मनुष्य किसी वस्तुका त्याग नहीं करता वरं पके फर जैसे बरक्षसे आप हय गिर पडते है, संसारसे वह सर्वधा निरत हो जाता है | ठोहेके तप्त गेख्को हाये छोड देनेके स्थि किसके अदेककी प्रतीक्षा होती है ?

गीतामाप्यमे यह सिद्धान्त भगवान्‌ शंकराचार्थने प्रतिपादित किया है। आधुनिक संसारके इतिहासे शंकर-नैसा को$ ज्ञानी ओर दानिक दूसरा नहीं मिक्ता उनके सिद्धान्तोको समश्नेमे यह हिन्दी-अनुवाद्‌ अत्यन्त सहायक होगा, इसमे कोई सन्देह नहीं अनुवादक महारायके सराहनीय परिशरिमकी सफठ्ता इक्तीमे है कि आवचार्थके सिद्वान्ते हम सुगमतापूर्वक परिचय प्राप्त करं ओर हममे सुसुश्चुताका माव मदप्रकार जागृत हो

काशी हिन्दुचिश्वविद्याख्य आश्विन शुद्क ४, सं० १९८८ | जीवनशङ्कर याक्ञिक |

भ्रीपरमास्भने नमः

नम्र निवेदन

तमेव माता पिता लमेव तमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव } लमेव विचा द्रविणं लमेव तमेव स्म॑ मम देवदेव

मूक करोति वाचाढ्‌ पुं रंधयते गिरिम्‌ यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्‌

परम आद्रणीय जगदूगुरश्रीश्रीभायरंकराचायं भगवानुत विभ्वविख्यात श्ीमद्धगवहवीता- भाष्यको कोन नदीं जानता भज यह माप्य गीताके समस्तभाष्य जोर टीमाञभि मुकृटमणि माना जाता, वेदान्तवे पथिकोके लिये तो यह परमो्छषट पथपदशंक ह, इसीरिये प्रायःसमी अद्वेतवादी टीकाकारोने इसका सर्वथा अनुसरण किया दै आचार्ये कथनसे यह सिद्ध होता हे कि उने भाष्य-निमाणके समय श्रीमद्धगवद्ीतापर अन्य हुत-सी टीका प्रचित थी, चेद हे किं आज्ञ उनमे ते एक भी उपरन्ध नही है परन्तु आचाय कहते फि उनसे ग्रम्थका यथाथ तच्च भटीभौति समञ्च नही आता था, उसी यथार्थं त्वको दिखछानेके छ्य भआचाको स्वतस्व भाप्य-स्वना करनी पड़ी इस भाष्य आचारयने वदी ही वुद्धिमानीके साथ अपने मतकी स्थापना की ! खान- स्थानपर शास्राथंकी पद्धतिसे विस्तन विवेचन कर अर्को सु-सपष्ट किया

समयसे जगते श्रीमद्धगवद्रीताका प्रचार जोरसे वढ़ रहा दे सभी प्रकारके विद्धान्‌ अपनी-अपनी इष्टि गीताका मनन कर रहे है, परन्तु गीताका मनन करनेके चयि आचार्य भाष्यको समद्वनेकी बड़ी ही आवद्रयकवा हे इलीतसे अनेक विभिन्न भाषासम भाष्यका अयुवाद्‌ मी हो चुका है हिन्दीमे भी दो-एक अदुवाद्‌ इससे पूवं निकले ये, परल्तु कई कारणस उनसे दिन्दी-जनता विरोष काम नहीं उठा सकी, शसीसे हिन्दीमे एकर पेते अनुवादके प्रका्ित टोनेकी आवदयकता प्रतीत होने रुगी, जिससे गीतप्रेमी दिन्दी-भाषी पाठक सुगमतासे आचायंका मत जान सके]

मेरे पूजनीय ज्ये भ्राता धीजयदयालज्ञी गोयन्दकाने, जिनके अनवरत संग ओर सदुपदेशो- से मेर इस ओर किश्चत्‌ प्रृत्ति हई ओर होती है, सुते भाप्येका अनुवाद करनेकी आक्षा दी; पदे तो अपनी विदया-वुद्धिकी ओर देखकर मेरा साहस्र नहीं इभा, परन्तु उनकी छृपाभरी प्रेरणाने अन्तम चे इस कामे प्रवृत्त कर ही दिया

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गत खं० १९.८४ के मागंरीषं-मासमे तने व्यापारे कामसे पतिदिन कुछ समय निकालकर अनुवाद्‌ करना आरम्भ किया ओर माधके अन्ततक् सतरदवें अध्यायतकका अलुवाद खिल गया इसके. पश्चात्‌ अनेक बार ग्रन्थक प्रकारित करनेकी वात उदी परस्तु अपनी भद्पक्घताके कारण किसी

9 अच्छे विद्वारकतो दिखाकर संसोचत करवाये विना छपानेक्रा साटस नहीं हु ! इख वार मेरे पाथना करनेपर श्रीचियुद्धानन्द्‌ खरस्वती अस्पताल कठ्कन्ताके प्रसिद्ध वैच पं० दरिवक्षजी जोदगि काव्य-सांख्य-स्युति-ती्थं महोदयने भायः एक माखतकः कखिन परिश्रम करके खमरत ग्रन्थक मूक माष्यके खाथ क्षराः मिलकर चथोचित संञ्चोधन कर देेकी कृपा की इखीसे आज यद जाप खोगोकी सेमे सुद्रितरूपसे उपस्थित किया जा सक्ता है ! इख कृपाकर चयि मै वम्माच्य भ्रीजोशीजी महाराज्का हदयस ईतज्ञ }

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अथनी अल्पुदधि ओर सीमित साम्येके अजु खार यथासाध्य मैने सरर हिन्दीमे चाचायेका साच ज्यो-ज्न-त्यो स्वनेकी चेष्ठा की हैः तथापि तै चह ऊह नदं सक्ता, मै इखमे सम्पूर्णतया सफर इभा हृं एकत तो परम ताच्िक्न चिपयः दखरे आचार्यच्ती लिली इई उस काकी कठिन संस्कत: जितम वड़-वडे विद्धान्‌ भी गीताक्चम्बर्थी विषयक्ा अध्ययन कम होेक्ते कारण श्रमे पड़ जाया करते हैः मुदच-ञैसा खाधारण मयुभ्य सर्वथा अमरदित दोनेका दावा कते कर खकता हे तथापि

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भगवत्छपासे जा क्छ दो खक्ा हेः बह यापक्ते सामने दै ! विययकी कठिनता कटी-करी वाच््य- स्वनाम क्तडिनता गयी हो तो सहरेय पाटकः क्रमा करे देसे अन्यके अजुवाद्मे किन-किन कठिनाद्याका सामना करना पङ्ता है यर अपनी खतत्नताक्ो छोडकर पराघीनताक्ते किन-किन प्वचमनि कस वरध जाना पड़ता हैः इतका सुभव उन्दी पारक ओर लेखक महोदयोको है जो कभी इसप्रकार कार्यं कर डके दैः या कर

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भयवन्‌ अ्रीक्ृ'णङे परम अनुरहस मननका सुखकर प्रात इथा, यह मेरे चयि (4

सुञ्च-सरीख व्यक्तिकरो आचायृत भाध्यके किंञ्ित्‌ वड़े ही सौभाग्या विपय ! श्रद्धेय विद्रन्मण्डटयी अप्र याता. महाद्खभाचोसे माना दै किं वे वालक्तके भयाखको स्नेदपू्वंक देखं ओर जरठो

से

ष्णो

टच्छा

का भमाद्वय भूल सड भचा हो, उसे वतरने कृपा अवदय कर, जिसे सुनने अपनी भूर्लोक धासन मवत्तर भरं जर चदि खम्पव हो तो आगामी खंरकरणमे शट घुधार दी जार्यै 1

सरा नदी जानता तथापि जर कुछ विरोप खमन्चनेकी भावदयकता इई हे वहं मने पूना जचायच्ुखके आचा्॑भक्त पं० श्रीविच्छु वासन वापर शाश्च खदावता ली इसके चयि नै पण्डितजीक्रा कृतक हं 1

~

साजा कइत सरार अन्यथ

५.

एकत चात्त ध्यानम्‌ रखनी चाद्ये ! सवाद कैखा ही क्यो

होः जो आनन्द ओर खारस्य सल्न्यम हता वह अलुवादमं नदीं जा खक्ता 1 इसी विचारे इसमे मूढ भाप्व भी साथ रक्ता कया साचारण संच्छृत जाननेवाठे सजन भी आव्रा्यक्े मूर सेखक्तो खद ही समन्न सकः

त्द्धिः साग करके सखि सये तो

विद्धा सदोद्रययण

41

ईसक्र †ख्य॒ माष्यकरे पद्‌ जख्ग-जल्ग करके जोर चात्त्योके छेको

ऊन पड़े

पूचपञ्च आर उत्तरपन्चकी पाटक्तक्तो इससे एतष्यकः

| 1

भाप्यमे मूढ छोकके जो खाव्द्‌ आये हैः वे दूसरे डादपौमे, तथा जदा प्रतीक आये है, ते दूसरे रादपोमे दिथे गे भूल छोकके पदो का आे-पीेक्रा सम्बन्ध जोडनेके खयि भाष्यकार जसा छिखा है वैसा ही कर दिया गया है परन्तु सभी जगह यद वात हिल्वीमे किखकर नहीं जनायी जा सकी, अतः कदी-कदीं तो टिप्पणीमे इसका स्पष्टीकरण कर दिया हे, करटी ऋछोकके अन्तमे लिखा गया है ओर कदं उसके अनुसार कायं कर दिया गया हे, चाब्दोका अथं नदीं दिया गया हे

आचायने खमाखोका जो विग्रह दिखाया हे, उसके खम्बन्धमे भी यदी वात ! जद्यौतक्त वन पड़ा है, उसी परणाखीसे अघुवादमे समासका विग्रह दिखलनेकी चेष्ठा की गयी हे, परन्तु जौँ भाषाक श्ेटी विगड्ती दिखलायी दी है वर्ह उस विग्रहके अयुकरढ केवल अथं लि दिया गया द, विग्रह नदीं दिखखाया गया दै पाठकगण मेरी असुविधाओंको देखकर इसके ल्य शमा करेगे!

आचा्यने श्रुति-स्टृति-पुराण-इतिहासोके जो प्रमाण उद्धृत किये है, वे किस ग्रन्थके किख स्थरके है, यह भी दिखलङनेकी चेष्टा की गयी है वर्ह जिन सांकेतिक चिहोका पयोग किया गया है, उनकी-सूतची अलग छपी है 1

अदुचादमें पर्याय वतखनेके लिये करी अर्थात राब्दसे तथा कीं (-) खसे काम खिया गया है 1 समास करलनेके लिये (-) छोरी लाइन रुगायी गयी है

भकादाककी श्रार्थनापर काली हिन्दुविश्वविद्याटयके विद्धान्‌ पोफेखर सम्मान्य पं० जीवनशंकरजी याक्षिक एम० पए० महोद्यने इस ग्रन्थक खुन्दर भूमिका छिखतेकी रपा की हैः

इसके दिये उनका हृदयसे कृतज्ञ चिनीत

हरिङ्ष्णदास गोयन्दका

शै

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्षमा-पथेना परमार्थ-त्रिय प्रेमी आहकोने इस पुस्तकको आदर देकर इसका पहला संस्करण पक ही वर्प विक जानेमे जो हमे खद्ायता दी उसके लय हम सबके छतक्ञ हे दुखरा संस्करण छापनेमे कड कारणोसे बहुत देर हो गयी जिन-जिन सज्ञनोंने पिख्ठे महीनों इसके चयि मग मजी जौर उन निराया होना पड़ा उन सवसे इस कण्टके लिये ट्म क्षमा मौँगते ! अव वे सज्लन कृपा करके पुनः आक्ञा दगे तो पुस्तक यथाखमय उनकी सेवा

मरेजी जा सकेगी ! इस वार अनुवादक महोदथने इसमें ज-तत्र आवदयक साधन आर पारिबतन कर दिया

हे संश्लोधनके सस्वन्धमे जिन-जिन खनने अपनी सूल्यवान्‌ सम्मति दी थी उनके इम आभारी है 1 पद्‌-सूचीके पृष्ठ बढ़ाकर पदटेसे अधिक साफ़ छापी गयी है 1 इसमे खचं ङु वदृ जानेपर भी मूल्य पदेवाला ही रक्खा गवा है } इस संस्करणको भी मेमपू्वंक अपनानेक्ती मननश्लील सज्वनोत्ि £ > दै सजनेंसे पाथना दै 1 प्रकारक

अध्याय-सुची

पृष्ठ अध्याय ४५ दशमोऽध्यायः पक्राद्योऽध्यायः दरऽध्यत्यः अयोदंशो ऽध्यायः चतुरंयोऽध्यायः पञ्चदशोऽध्यायः पोडदोऽध्यायः सत्तदरोऽध्यायः

, अष्रादशोऽन्यायः

सकितिक चिहका स्पष्टीकरण

अध्याय ग्रधमोऽध्यायः द्वितीयोऽध्यायः दतीयोऽध्यायः चतुधाऽश्यायः पश्चमोऽभ्यायः पष्ट ऽध्यायः सप्तमोऽध्यायः अथ्रमोऽध्यायः वमो ऽध्यायः संकेतं स्पष्ट तु बु० बृहदारण्यक उपनिषद्‌ चह० चछछाण 4 छाच्यो० छान्दोग्य उपनिषद्‌ च्ा० उण ना० उ० = सारायणीपलिपद जाचा० = जावाद्ोपनिपद्‌ ` त० स० = तत्तिरीयसंहितां त° = तैत्तिरीय उपनिषद चेन | केन उपनिषद्‌ प्र०उ० = प्श्लोपनिपद चरा > ॥-7 {.. ॥-4। टोः परिषद | कठोपनिषद्‌ ९. ६० ड० = इोयनिपद्‌

२-३न्दावन-विदारी (स्गीन) भगवान्‌ यीशद्करचरार्चजी (सादा )

दे-मोदनाखक शरीर्प्ण (रंगीन)

' संकेत स्यष्ट ¦ श्वे० उ० ताश्वतसेपलिषद्‌ चरू० प° उ० = चर खहप्रूव तापनायापचिपद्‌ सु० = मुण्डक्नोपनिषद्‌ कतै० रा० = दैत्तिसैय ब्राह्मण तै० आर० = तैत्तिरीय आरण्यक सहुा० द्य महाभारत सान्तिपर्च [ मदहाण्यान्ति | ह॒ सान्तिपचं

सद्य० दी = महाभारत खीपर्ं

मनु

= मयुस्मति

विच्णु० पु० = विष्णुपुराण वचा० ध० = बोधायन स्यति

रो०

गौतम स्सति

अआ० स्ु° = आपस्तस्च स्मृति

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चित्र-सूची

४५६ भूमिकाके सामने पृष्ठ पृष्ट

नै 4 १९२

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२१) धर ॐ.

0 (क 1.

[1 भगवान्‌ श्रीरंकराचार्यजी (ॐ

(स) रवी ११ ९2) £~ 9 ६2: प्स इः 4 12 -- ड। रः (~ 9 4

73. 5.

श्रीहरिः +

तत्सदुब्रह्मणे नमः

श्रीमद्वगवटीता

श्रीमच्छांकरभाष्य

हिन्दीभाषाञुवादसहित उपोद्षात )

नारायणः परोऽव्यक्तादण्डमग्यक्तसंभवम्‌ अण्डस्यान्तस्तविमे रोका; सप्तद्वीपा मेदिनी १॥

अव्यक्ते अर्थात्‌ मायासे श्रीनारायण-- आदिपुरुष सर्वथा अतीत ( अस्पृष्ट ) है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अन्यक्त-- प्रङृतिसे उतपन्न इआ है, ये मूः, मुवः आदि सब ठोक ओर सात दवरपोवाली पृथिवी

्रहाण्डके अन्तर्गत है |

भगवान्‌ सृष्टा इदं जगद्‌ तस्य च| इस जगठ्‌को रचकर इसके पाटन करनेकी सिति चिकीर्षुः मरीच्यादीन्‌ अग्रे घुष्ट | इ्छावाठे उप्त मगवानने पहर मरीचि आदि प्रजापतीन्‌ प्रवृत्तिलक्षणं धमं ्॒राहयामाघर | प्रजापति्ोको स्चकर उनको वेदोक्त प्रदृततिरूप वेदोक्तम्‌ ( धर्म ( कर्मयोग ) ग्रहण करवाया

तत्त; अन्यान्‌ सनकसनन्दनादीन्‌ | , फर उनसे अठ्ग सनक, सनन्दनादि ऋपिर्योको

उत्पा निवृततिरक्षणं धर्म ज्ञानवैराग्यलक्षणं | रचकर उनको ज्ञान ओर वैराग्य जिसके र्षण है ठेसा निदृत्तिरूप धर्मं (ज्ञानयोग) प्रहण करवाया

ग्राहयामास ) द्विविधो हि वेदोक्तो धर्म, प्रशृ्तिरक्षणो | वेदोक्त धमं दो प्रकारका दै--एक प्रदृत्तिरूप, निदृत्तिरक्षणः दूसरा निदृक्तिरूप

जगतः सिविकारणं प्राणिनां साक्षात्‌ | जो जगतकौ स्थितिका कारण तथा प्राणियो- >+ चैः | की उत्नतिका ओर मोक्षका साक्षात्‌ हेतु है एव

भ्युदयनिःमरेयसरैतुः यः धर्मो ब्राह्मणाः | अभ्बुदथनिः यसेः _ . _. | कल्याण-कामी ब्राह्मणादि वर्णाश्रम-अवड्म्बियोदारा -अणिभिः आश्रमिभिः भ्रेयोऽ्थिभिः | जिसका अनुष्ठान .कियां - जाता है उसका नाम

& अयुष्ठीयमानः पमं है|

श्रीमद्गवद्रीता

[कटक

दर्वेण कठेन अचुष्ठावरणां कमोद्धवात्‌ | वहत काटे धमीनुष्टान करनेवाके अन्तः- करणम कामनार्ओका विकास होनेसे विवेक-विज्ञान-

दोयमानविवेकविज्ञानहतकन अधमण आभः |काहासहयोजाना हौ जिसकी उत्पत्तिका कारण | हैः एसे अधर्मसे जव धर्मं दवता जाने व्गा ओर्‌ ¦ अघमंकी इद्धिहोने खी तत्र जगत्की खिति जगतः स्थितिं परिपरपाटयिषुः आदिकतां ` सुरक्षित रखनेकी इच्छावाटे वे आदिकतौ नारायण- नामक श्रीविष्णुमगवान्‌ मूढोकके तब्रह्मकी अथात्‌

नारायणाख्यो विष्णुः भोमस् ब्रह्मणो भूदेव ( ब्राहमणो) के त्राह्मणत्वकी रश्च करनेके च्ि श्रीवदुदेवजीते श्रीदेवकीजीके गमम अपने

, अंशसे ( खीटाविग्रहसे ) श्रीकृष्णद्पर् प्रकट इए |

भूयमानं धम प्रवर्धमाच अचः

ब्राह्मणत्वस्य रक्षणाथं देवक्यां वसुदेवात्‌

त्राह्मणलस्य हि रणेन रक्षितः खात्‌ तैदिको ` त्राहणलकरी रक्षसे ही वैदिक धर्म सुरक्षित +. ९, = क्यो ¢ _ ७, @ & धर्मः तदवुलनि्ात्‌ वणाश्रमरमदानाम्‌ | | होगा क्योकि वर्णाश्चमेके मेद उसीके अधीन है |

स॒ भगवान्‌ ज्ानैशवर्यशक्तिवलवीय- ¦ ज्ञान, रेर्व, शक्ति, वर, वीयं ओर तेज तेजोभिः सदा संपन्नः त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं ` आदिते सदा सम्पन्न वे भगवान्‌, यद्यपि अज, खं मायां भृरप्रकतिं वीत्य अनः ' अविना, समरणं मूके शखर ओर नित्-ञद्- अव्ययो भृतानाम्‌ ईश्वरो निल्यशुदधबुद्ध- ¦ बुद्र-सुक्त-खमाव है, तो मी अपनी त्रिरुणातिका ग्क्तखमभावः अपि सन्‌ खमायया देहवान्‌ इवान्‌ , मृ प्रकृति वैष्णवी मायाको वमे करके अपनी इवं जात इव लोकासुग्रह वेन्‌ इव ' ठीलसे चरीरधारीकी तरह उत्पन इए-से ओर र्गो लक्ष्यत | , प्र अतुप्रह करते इषए-से द॑खते हं

खप्रचोजनाभव्रे अपि भूतादुजिधूृक्षया ¦ अपना को प्रयोजन रनेपर मी मगवान्‌ने वेदिक दि धर्म्यम्‌ अर्ुनाय लोकमोहमहोदधौ ' मूर्तोपर दथा करनेका इच्छसे, यह सोचकर . कि {क ® = [कृ अधिक र्ब्राच्‌ व्रा प॒रुपोद्रा ग्रहण ओरं निमाय उपदिदेश, गुणाधिैः हि : अभिक यगबान पुरुपोयारा ग्रहण किया इंआ ओर्‌ ^ आचरण किया हआ धमं अधिक विस्तारको ग्राप्त गमिष्यति इति दोनो ही प्रकारके वैदिक धर्मोका उपदेश करिया | ते धुम्‌ भगवता यथोपदिष्टं ॒बेद्‌-, उक्त दोनो प्रकारके धर्मोको मगवान्‌ने जैसे-जैसे व्यासतः सवज्गा मगवा्‌ गोताख्यः सम्घभिः कहा या, ठीक वैसे ही सर्व मगवान्‌ वेदव्यासजीनि शकरतः उपन्‌वरवन्ध्‌ | गीतानानक सात सो शकक खपे मथित करिया | , चत्‌ गीतागां समसतवेदार्थसार- रेस यह गीताशचाव संमपूर्ण वेदा्थका सार-सं्रद- सग्रदभूत दुविज्ञयाथेम्‌ 1 न्प ओर्‌ इसका अर्यं समद्नेमं अत्यन्त कठिन है

श्न =

सांकरभाष्य (उपोद्घात )

"न= ~--------------------------------------- + [कका करक कणन

तदरथानिष्करणाय अनेकैः पिधृतपदपदार्थ-

चां्याथन्यायम््‌ अपि अत्यन्तविरुदरानेकाथ- सवेन लोकिः गूहयमाणम्‌ उपलभ्य अहं विवेकतः अथेनिर्धारणा्थं संक्षेपतो भिवरणं करिष्यामि

त्ख अख गीताक्षास्रय कषेपतः

श्रयोज्न॒परं निःश्रेयसं सरैतुकख संसारख © 9

अत्यन्तोपरमलक्षणम्‌ तत्‌ सर्वकर्मसंन्यास

> ^*१^ + 4 ^ ++ ०८८4 ~ +~ ~~ <^ ~ +

यद्यपि उसका अर्थ प्रकट करनेके च्यि अनेक पुरूषोने पदच्छेद, पदार्थ, वाक्यार्थ ओर आक्षेप, समाधानपूर्वक उसकी विस्तृत व्याख्याए कौ है, तो भी टीकरिक मचुर्योहरारा उस गीतासाख्रका अनेक प्रकारसे (परस्पर ) अत्यन्त विरुद्ध अनेक अर्थं प्रहण विये जाते देखकर, उ्तका विवेकपूर्वक- अर्थ निश्चित करनेके स्यि मँ संक्षेपे व्याल्या करूगा 1.

संक्षेपमे इस गीताशाल्चका प्रयोजन परमकल्याण अर्थात्‌ कारणसदहित संसारकी अव्यन्त उपरतिं हो जाना है, वह ( परमकल्याण ) सर्व-कर्म-संन्यास-

पकात्‌ आस्मज्ञाननिष्टाूपात्‌ धर्मात्‌ भवति | पूर्वक आसमननाननिष्ठारूप धर्म प्राप्त होता है

तथा इमम्‌ एव गीताथधर्मम्‌ उदिश्य भगवता एव उक्तम्‌ हि धर्मः पुपर्यातो ब्रह्मणः

प्दव्दने' इति अचुगीतासु

= = इसके सिवा वहीं रेषा मी कहा है कि, जो

अन्यद्पि तरव उक्त धर्मी, अधमौ भौर शुभाशुभी होतारै तथा नवेव धर्मान चाधमीन चैव हि चुमा्रु्भा। | जो कुक भी चिन्तन करता इहा तूष्णीभावसे

¦ एक जगदाधार ब्रह्मम छीन हुआ रहता है (वी

यः स्यादेकासने लीनसर्णीं किञचिदाचिन्तयन्‌ ॥° | उसको पाता है ) #

यह मी कहा है कि, ्ञानक्ता क्षण ( चिह्र ) संन्यास है #

इसी गीतार्थ-रूप धर्मको रक्ष्य करके खयं मगवान्‌- ने ही अदुगीतामें कहा है कि, श्रह्मके परमपद्कतो ( मो्चक्तो ) प्रा करनेके लिये बह (गीतोक्त ज्ञान- निष्ठारूप) धमं ही खुसमथं है

स्नानं संन्यास्तलक्षरम्‌' इति

इह अपि अन्ते उक्तम्‌ अञ्ुनाय-- यह ( गीताशास्मे) शी न्ते अर्थनस कहा है- पर्षषमौन्परित्यन्य मामेकं शरणं तरज' इति | सव ध्मोकि छोडकर एकमत्र मसे शरणम -यि (= मा) धर्मौ अभ्युदय-सांसारिकं उन्नति ही जिसका फक) यम्या | धर्म, वर्णं ओर आश्रमोको वणाश्रमान्‌ उद्य प्रहतः वाद्‌ | दय करके कहा गया है, वह यचपि स्वगीदिकौ स्थानग्रा्िहेत्‌ः अपि स्‌ हवरापणबुद्ध्या प्राप्तका ही साधन है तो मी फलकामना छोडकर अनुष्ठीयमानः सश्वश्यद्धये भवति फठामि- | $खरार्पण-वुद्धिसे किया जानेपर अन्तःकरणकी सन्धिवर्जितः। द्धि करनेवादा होता है शुद्धसलसख ज्ञाननिष्ठायोग्यताप्रा्नि- | तथा युदधान्तःकरण पुरुपको पे हरिण ज्ञानेोत्पत्तरेतुसेन निः ्ेयसहेतुखम्‌ | योग्यताप्राति कराकर फिर ्ानोतपसतका हे - अपि प्रतिपद्यते। से (वह प्रवृत्तिरूप धर्म) कल्याणका मी हेतु होता है

= + = ~ + ^

तथा इमम्‌ एव॒ अर्थम्‌ अमिर्धाय : वकष्यति-त्रण्याषाय कर्मणिः शयोगिनः कर्व | ङ्गं त्यक्तरात्मङुदये इति

१८

कृकानत

इम॑द्विमकारं धमे निःश्ेयसप्रयोजनं परमार्थत वासुदेवाख्यं परं बह्म अभिधेय- भूतं व्रिदोपतः अभिव्यञ्जयत्‌ विशिष्भयोजन- सम्बस्धामिधेयवत्‌ गीवाशाच्म्‌

9 ¢ ॥।

यतः तद्धे विज्ञाते समसतयुर्पार्थाद्धिः

अतः तद्विवरणे यत्तः क्रियते मया |

श्रीमह्गवट्ीता

^ ~~ ~~~ +~ ~ ~ + ~~~ ~~~ +~ ~~~ ~ ~ ~ ~ ~ +~ ~ ~~

इसी अर्थकतो ठ्स्यमे रखकर आगे करेगे कि, "क्मोकरो व्रह्म धर्पण करः "योगिजन आसक्ति छोड- कर आत्मशुद्धिके ल्य कमं करते है इत्यादि

पर्नकल्याण ही जिनका प्रयोजन है रेसे इन दो

प्रकारके धर्मोको ओर छस्यमूत वासुदेवनामक

¢ विरो अभिग्यक्त

पर्रह्मप ॒परमाथतच्छको विरोधख्पसे अभिग्यक्त

( प्रकट ) करनेवास यह गीताच्चा्च, अपाधारण प्रयोजन, सम्बन्य ओर्‌ विधयवाल है

ठेते इत गीतादाच ) का अर्थं जान दठेनेपर्‌ समल्न पुरपारयोक सिद्धि होती है, अतएव इसक

~ चिवि रै प्रयत्न करता ` व्याद्या कर्‌चक ।ख्यं मे प्रयत्न करता

श्रीमद्गवद्रीवा प्रथमोऽध्यायः

धृतराष् उवाच-- धर्मकतेत्रे कुरक्ेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय

धृतराष्ट्र बोे-हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रे युद्धकी इच्छासे इक होनेवाठे मेरे ओर पाण्डुके

पुत्रोने क्या किया १॥ १॥ संजय उवाच-

दृ्वा तु पाण्डवानीकं न्यूढं दुर्योधनस्तदा आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमव्रवीत्‌. २॥ संजय बोखा-उस समय राजा दुर्योधन पाण्डवोकौ सेनाको व्यृहरचनासे युक्त देखकर गुर द्रोणकं पास जाकर कहने खगा ॥२॥ पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचायं महतीं चमूम्‌ व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव॒ शिष्येण धीमता गुरुजी ! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य दरुपदपुत् धृष्टचुप्नदरारा व्यूहर्चनासे युक्त कौ हृदं पाण्डर्वोकी इस वधी मारी सेनाको देखिये ॥३॥ अत्र शूरा महेष्वासा भीमाजनसमा युधि युयुधानो विरायश्च दरपदश्च महास्थः॥ 8॥ धृष्ठकेद्रेकितानः कारिराजश्च बीयैवान्‌ } पुरुजित्कुन्तिमोजश्च रोव्यश्च नरपुड्वः युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सवै एव महारथाः॥ ६॥ इस सेनामे महाधुर्भर वीर, डने भीम ओर अर्जुनके समान सात्यकि, विराट ओर महारथी

हुपद, वरख्वान्‌ धृष्ठकेतु, नवेकिंतान तथा काशिराज एव नरश्रेष्ठ पुरुजित्‌, कुन्तिभोज भर रोव्य, पराक्रमी युधामन्यु, वठ्ान्‌ उ्मौजा, घुमद्ाु्र अभिमन्यु ओर ्रौपदीके पो पुत्रे समौ महारथी दँ ४, ५५ ६॥

श्रीमद्भगवद्रीता

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध हिजोत्तम नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्तरवीमि ते॥ ७॥

द्विजोत्तम ! हमारे पक्षके जो प्रधान हैँ उनको आप समञ्च ठीजिये } आपकी जानकारीके चयि रँ उनके नाम बतद्मता हँ जो कि मेरी सेनके नेता है ॥७॥

भवान्भीष्मश्च क्णेश्च कृपश्च समितिजयः। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव

आप, पितामह मौष्म, कर्णं ओर रणविजयौ कृपाचार्य, वैसे हयी अश्वत्थामा, विकर्णं ओर्‌ सोमदत्तका पत्र (भूरिश्रवा ) ॥८॥

अन्ये बहवः शूरा मदथ त्यक्तजीविताः नानाश्प्रहरणाः स्वे युदविशारदाः॥ ९॥ इनके सिवा अन्य मी बहुत-से शूरवीर मेरे थि प्राण देनेको तैयार है, जो कि नाना प्रकारके शलोको धारण करनेवाठे ओर सथ्र-के-सव युद्धविवामे निपुण है ॥९॥ अपयाप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ | प्याप्तं लिदमेतेषां बरं भीमाभिरक्षितम्‌ १० सी वह पितामहं भोषद्वारा रक्षित हमारी सेना सतर प्रकारसे अजेय है ओर भीमदरारा रक्षित इन पाण्डवोकी यह सेना सहज हयी जीती जा सकती है ॥१०॥ अयनेषु सवषु यथामागमवसिताः। मीष्ममेवाभिरकषन्तु भवन्तः सवै एव हि ११॥

अतः आपरोग सव-के-सव सभी मोर्चोपर अपनी-अपनी जगह टे इए केवर पितामह मीष्पकी दी रक्षा करते रहे ॥११॥

तस्य॒ संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः सिंहनादं विनचोचैः शङ्कं दध्मौ प्रतापवान्‌ १२॥

इसके वाद दुखंरिर्योमं धृद्ध प्रतापी पितामह भीष्मे उस दु्योधनके हृदयमे हषं उत्पन्न करते हए उच स्वरसे सिंहके समान ग्जर्‌ शङ्क वजाया ॥१२॥

, ततः राङ्खाश्च भेये पणवानकगोुखाः

सहसैवाभ्यहन्यन्त स॒ शब्ध्स्तुयुरोऽमवत्‌ १३॥

फर्‌ एक साय ही शह, नगरे ढोर, मृदंग ओर रणरसिंगा आदि बाजे वजे वह शब्द बड़ा मयद्भुर्‌ हृ ॥१२॥

साकरभाष्य अध्याय ७. ततः श्रते महति स्यन्दने खितौ। = ` माधवः पाण्डवशरेव दिव्यौ रङ्को प्रदध्मतुः १४ पिर सपद धोए गुक्तं वडे मारी रथम परैठे हए श्रीृष्ण ओर अर्जुने भी अपने अलौकिकः व्रजामि १४॥ पाञ्चजन्यं हषीकेशो देवदत्तं धनंजयः | पाण्डुं दध्मौ महाश्खं भीमकम इकोदरः १५ शाने प्रतजन्यनामकः ओर अर्युनने देवदत्तनामक राद वजाया | भयानक कर्मकारी चृकाद्र्‌ भासन पण्टूनामवः वजाया १५॥ अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः नङुटः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ १६ कुन्तीपुत्र राना युधिष्टिने अनन्तवरिजगय, नञ्ुटने सुघोष ओर सहदेवने सणिपुष्पकनामक द{ तचजाया १६॥ काष्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी महारथः | धृष्टयुश्वो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः १७ दुपदो द्रौपदेयाश्च सवशः पएथिवीपते सोमद्रश्च महाबाहुः शाङ्कान्दध्युः एथक्‌ पथक्‌ १८ पृम्वीनाथ ! माधुरी काशिराज, महारथी शिखण्डी, धरटयु्र ओस्‌ विराट, अजेय सात्यकि,

14 चः `

रषद ओर्‌ द्रौपदीके पाचों पुत्र तथा महाबा सुभद्रापत्र अभिमन्यु इन सवने भी सव्र ओरसे अखा-

अग टा वनाय | १७, १८ घोषो धार्तैरा्णां हृदयानि ग्यदारयत्‌

नमश्च प्रथिवी चैव तु्चखो उयदुनादयन्‌ १९

यह भयदरुर्‌ श्च्द आकरा ओर्‌ पृथिरवीको गजता इआ धृतराू-पत्रकि हृदय विदीर्ण करने लगा ॥१९॥ अथ ज्यवसितान्टषट धातेरा्ून्कपिष्वजः मवृत्ते शखसंपाते धडरुधम्य पाण्डवः २० हपीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते सेनयोरभयोर्मध्ये रथं खापय मेऽच्युत २१ यावदेताच्निरीक्षेऽहं योदधूकामानवस्थितान्‌ कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुयमे २२

< श्रीमद्भगवद्मीता

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हे प्रथ्वीनाथ ! फिर उस चठनेकी तैयारीके समय युद्धके स्थि सनकर्‌ उटे इषए धृतराषट पतरौको देखकर कपिष्वन अजुन धनुष उठाकर श्रीकृष्णे इस तरह कहने खगा कि, है अच्युत जबरतक मै इन खे इए युद्धेच्छुक वीरोको भठीमोंति देखू किं इस रण-उयोगमे मुशने किन-किनके साथ युद्ध करना है तबतक आप मेरे रथको दोनों सेनाओके बीचमे खडा रखिये ॥२०, २१,२२॥ योस्स्यमानानवेक्तेऽहं एतेऽत्र समागताः | धार्तरा्टस्य दुरु प्रियचिकीर्षैवः २३ ( मेरी यह प्रचर इच्छा है कि ) दुर्मति दुर्योधनका युद्ध मला चाहनेवाछे जो ये राजाछोग यहाँ आये है उन युद्ध करनेवाखंको भै मरी प्रकार देख २६ सजय उवाच- एवमुक्ता हषीकेरो गुडाकेरेन भारत सेनयोरमयोमष्ये सख्ापयित्ना रथोत्तमम्‌ २९ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां महीक्िताम्‌ उवाच पाथं पद्येतान्समवेतान्कुरूनिति २५ संजय ब्रोल-हे मारत ! निद्राजित्‌ अ्॑नद्वारा इस प्रकार प्रेरित इए श्रीकृष्ण उस उत्तम रथको दोनों सेनाओंके बौचमे भीष्म ओर्‌ द्रोणाचायैके तथा अन्य सब राजा्जोके सामने खड़ा करके नोर, हे पार्थ इक्र इए कौरर्वोको देख २४, २५ | तत्नापरयत्थितान्पाथः पितृनथ पितामहान्‌ आचायान्मातुान्घातृनपत्ान्योत्रान्सखीस्तथा २६ शवशुरान्सुहदभ्यैव सेनयोरुभयोरपि 1 तान्समीक्ष्य कौन्तेयः सवीन्धन्धूनवधितान्‌ २७ पया प्रथाविष्टो विषीदन्निद्मवरवीत्‌ ` द्म खजनं कृष्ण युयुत्सुं ससुप्ित्तम्‌ २८ ` सीदन्ति मम गात्राणि मुखं परिशुष्यति वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते २९

पिर वह प्रथापुतर अर्ुन वरह दोनो सेनाओंमे खडे इए अपने ताज-चाचोको, दादोको, गुरुभौको,

मर्मको, मयोको, पुनोको, पौत्रो, मि््ोको, सुरोको ओर इद्कको देखने ठा बह उन

समी कुटृभवर्योको खडे इए देखकर अत्यन्त करुणे धिरवार वह कुन्तीपुत्र अन शोक करता इभा इस प्रकार कहने खगा,

रिधर हो दे इण ! सामने खे इए य्धे्ुक खजन-समुदायकरो देखकर मेरे सब अद्ग हो रहे है, सुख सख रहा है, भैर दारीरमे कम्प ओर सोमाच्च होते है | २६, २७, २८,२९॥

साकेरभाष्य अध्याय

~ ~ ०५०५८

गण्डति स्लप्ततं हस्ताच्चक्चेव परिदद्यते | शाक्तम्यवस्ाठु मतीव मे मनः ३०॥

गाण्डीव धनुपर हाथमे खक रहा है, चचा वहत जख्ती है, साथ ही मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा ट, (अधिक क्या ) मै खड़ा रहनेमें भी समर्यं नहीं है ॥३०॥

निमित्तानि पश्यामि विपरीतानि केशव | श्रेयोऽयुपद्यामि हत्वा खजनमाहवे २१॥

हे केराव } इसके सिवा ओर भी सत्र र्ण मुञ्च विपरीत ही दिखायी देते है, युद्धम जपने वुख्को नष्ट करके यै कल्याण नहीं देखता ॥२३१॥

काद्र विजयं कृष्ण राज्यं सुखानि करं नो राञ्येन गोविन्दं किं भोगेजींवितेन वा ३२॥

हे कृष्ण {मेन विजय ही चाहता भौर राज्य या सुख ही चाहता | हे गोविन्द्‌ | हमे राञ्यसे, मोगेसे या जीवित रहनसे क्या प्रयोजन है ! ॥३२॥

यषामथं काङ्याक्षत नां राज्य मागाः संखाने | इमेऽवथिता युद्धे म्ाणांस्त्यक्त्वा धनानि ३३ आचायाः पितरः पुत्रास्तथैव पितामहाः मातुलाः शवहुराः पौत्राः श्यालः संबन्धिनस्तथा ३४ हरमे जिनके लियि राञ्य, मोग ओर सुख आदि इष्ट है, वे ये हमारे गुरु, ताऊ-चाचा, कड्के, दादा, मामा, समुर, पोते, सारे ओर अन्य बुदुम्बी योग धन ओर प्राणोको व्यागकर द्मे खडे दै २२, ३४॥ एतान्न हन्पुमिच्छामि च्रतोऽपि मधुसूदन अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं जु महीछरते ३५॥ हे मधुसूदन ! सुद्चपर वार करते हए मी इन सम्बन्धियोको त्रिरोकौका राज्य पनेके च्यिमी रै मारना नदद चाहता, फिर जरा-सी प्रध्वीके खि तो कहना ही क्या हे ॥२५॥ नह्‌प्य धातेराष्टाचः का प्रातिः स्याजनादन पप्रमवाश्रयदसाग्हत्वतानातता्यनः ३६ हे जनार्दन, इन शरृतराषट तरको मारनेते हमे कया प्रसन्नता होगी £ प्रयु इन आततापिर्योको मारनेसे हमे पाष द्यौ खेगा ॥३६॥ तस्माच्नाहौ बय इन्त धातैराष्टुन्स्रबान्धवान्‌ खजनं हि कथं हुत्वा सुखिनः स्याम माधव ३७

५५०. ५०५ १८ ०५ ५०५०९५४

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१० श्रीमद्धगवद्रीता

[थाक ननन

इततच हे माधव ! अपने कुटुम्बी धृतरा्टपत्रोको मारना हमे उचित नीं है, ककि अपने ुदुम्बको नष्ट करके हम कैसे एुखी हेग १।२७॥ यद्यप्येते परयन्ति रोभोपहतचेतसः कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे पातकम्‌ ३८॥ ययपि लोभकरे कारण जिनका चिच भरष्ट हो चका है देसे ये कौरव कुखक्चयजनित दोषको ओर मित्रके साय वेर्‌ करनेमे हयोनेवाठे पापको नदीं देख रहे है ॥२८॥ कथं त्तेयमस्माभेः पापादस्माननिवतिंतुम्‌ कुरक्षय्तं दोषं प्रपश्यद्धिजनादेन ३९॥ तो भी हे जनार्दन ! कुखना्च-जन्य दोपको भटी प्रकार जाननेवाठे हमठोगोको इस्त पापसे वचनेकरा उपाय क्यो नहीं खोजना चाहिये ॥२९॥ कुलक्षये प्रणरयन्ति कुरधमीः सनातनाः धम नष्टे कुं कत्लमधर्मोऽभिभवत्युत ४० (यहतोसिद्रहीहै कि) डुलका नाच होनेसे सनातन दुल्धर्मं नष्ट हो जाते है ओर धर्मका नाश होनेसे सारे कुरुको सवर भरसे पाप दवा ठेता है ॥४०॥ अधमौभिभवात्करष्ण प्रदुष्यन्ति कुरुखियः | सखीषु दुष्टापु वार्ष्णेय जायते वणसंकरः ४१॥. टे ¶ष्ण ! इस तरह पापसे धिर जानेपर उस कुख्की सिया दूपित हो जाती है हे वार्ष्णेय | यके दपरित होनेपर उस कुलम वर्णसंकरता जाती है ॥४१॥ संकरो नरकायैव कुरान रस्य पतन्ति पितरो ह्येषां टुप्तपिण्डोदकाक्रियाः ४२ चह वर्ीसंकता उन बुच्ातियोको ओर कुख्को नरक ठे जानेका कारण बनती है, कोकि उनकं पितरखोग पिण्डक्रिया ओर्‌ जलक्रिया नष्ट ह। जानेके कारण अपने स्थानसे पतित हो जाते है ॥४२॥ = * दोषैरेतेः ऊुल्नानां वर्णसंकरकारकैः | उत्साचन्ते जातिधमोः कुर्मी शाश्वताः ४३॥ (इष प्रकार ) बपंकरताको उत्पन्न करनेवारे उपर्ु्त दोस उन इुधातियकि सनातन कु्धर् ओर्‌ जातिधर्मं नष्ट हो जाते है ॥४२॥ उत्सन्नक्ुख्धमौणं मनुष्याणां जनाईन नरके नियतं वासो भवतीत्यनुडु्रम

साकरभाष्य अध्याय ११

गग्कच्ण

[भिक कय = ५० ९५. 1 1 01 कक काकणिक्कगकप्दनकाकोक कक कक कन्न ग्दारगक क्का

हे जनार्दन ! जिनके कुलधर्म नष्ट हो चुके दै एेसे मलुष्योका निस्सन्देह नरकमे वास होता है ठेसा हमने सुना है ४४

अहो बत महत्पापं क्तं व्यवसिता वयम्‌ | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं सखजनमुयताः ४५ अहो ! शोक है किं, हमरोग बडा मार पाप करनेका निश्चय कर बैठे है, जो किं इस राञ्यसुखके लोभसे अपने दुटृम्बका नाश्च करनेके च्वि तैयार हो गये है ४५॥ यदि मामपरतीकारमश्चश्ं शख्पाणयः | धातैराष्ट रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌ ४६ यदि सञ्च श्चरहित भौर सामना करनेवाठेको ये शखधारी धृतराष्ट्र दुर्योधन आदि) रणभूमि- मे मार डां तो बह मेरे स्यि वहत ही अच्छा हो ४६॥ संजय उवाच- एवमुक्तवाजुनः संख्ये रथोपख उपाविशत्‌ विस्ञ्य सशरं चापं शोकसंविभ्षमानसः ४७॥ संजय बोढा-उस रणभूमिं वह अञ्न इस प्रकार कहकर वाणोसहित धनुषको छोड रोकाङ्कुर चिचत हो रथके ऊपर्‌ वैठ गया ( पहले सैन्य देखनेके ल्यि खड़ा इथा था ) ४७॥

इति श्रीमहामारते शतक्तादख्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपवेणि श्रीमद्भगवद्रीतास्‌- पनिपसघु ब्रहमविवायां योगदाखे श्रीकृष्णाज्नसवादेऽजनविषाद्‌- योगो नाम प्रथमोऽध्यायः

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हितीयोऽध्यायः पजय उवाच-- तं तथा कूपयाविष्टमश्रुपूणाकुरेक्षणम्‌ विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः १॥ संजय बोल -इस तरह ओं मरे कातर न्ने युक्त, करुणासे धिरे इए उस शोकातुर अं नसे भगवान्‌ मधुसूदन यह वचन कहने खो श्रीमगवानुवाच- कुतस्त्या कश्मरमिदं विषमे समुपल्ितस्‌ अना्ैजुष्टमखग्थैमकीिकरमयैन २॥ हे अज्गन | तुञ्चे यह श्रे पुरुपरसे असेवित, खगैका विरोधी ओर अपकीर्तिं करनेवाला मोहं इस रणक्षेत्रे क्यो इआ १।२॥ ङ्कैव्यं मा गमः पार्थं नेतच्छय्युपपथते द्रं हदयदोबैर्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ३॥

हे पां | कायरता मत छा, यह